बिन तारों का सितार हूँ मैं
पिछवाड़े का असबाब हूँ मैं
भटक गया जो चकाचौंध में
उस बेटे का बाप हूँ मैं
पहली रात हुई जो सूनी
उसी मांग का ख्वाब हूँ मैं
सावन में भी ठूंठ रहा जो
उसी दरख्त की डाल हूँ मैं
ग़ुम हुई जो लाल घरों में
उस राधा का श्याम हूँ मैं
मुझे खिला खुद भूखी सो गई
ऐसी माँ का लाल हूँ मैं
पिछवाड़े का असबाब हूँ मैं
भटक गया जो चकाचौंध में
उस बेटे का बाप हूँ मैं
पहली रात हुई जो सूनी
उसी मांग का ख्वाब हूँ मैं
सावन में भी ठूंठ रहा जो
उसी दरख्त की डाल हूँ मैं
ग़ुम हुई जो लाल घरों में
उस राधा का श्याम हूँ मैं
मुझे खिला खुद भूखी सो गई
ऐसी माँ का लाल हूँ मैं
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