Sunday, 8 September 2013

कबाड़

बिन तारों का सितार हूँ मैं 
पिछवाड़े का असबाब हूँ मैं

भटक गया जो चकाचौंध में 
उस बेटे का बाप हूँ मैं 

पहली रात हुई जो सूनी 

उसी मांग का ख्वाब हूँ मैं

 सावन में भी ठूंठ रहा जो 

उसी दरख्त की डाल हूँ मैं

ग़ुम हुई जो लाल घरों में 
उस राधा का श्याम हूँ मैं 

मुझे खिला खुद भूखी सो गई 

ऐसी माँ का लाल हूँ मैं