Saturday, 3 August 2013

ये कैदे  बामशक्कत जो तूने की अता है 
जो की नहीं खताएँ  ये उनकी ही सजा है 

ये मातमो के मंजर हर राह मे लगे है 
हैवान आदमी पर अब हावी हो चला है 

गमगीन सी है गलियाँ सड़के भी सूनी सूनी 
जिसको भी देखती हूँ लगता वो गमजदा है 

पाला किये जिसे वो अपना लहू बहा कर 
लख्ते जिगर वो सारे अब दे गए दगा है 

आँखों को ख्वाब कितने परसे थे जिंदगी ने
 शीशे सरीखे टूटे क्यों किसको ये पता है  

माना ख़ुशी मुक्कमिल मिलती नहीं जमीं पर 
थोड़ी सी जो मिली है लगती है ज्यूँ सजा है

कब तक छिपेगा सूरज इन गम के बादलो से
आने को है उजाले इतना मुझे पता है