ये कैदे बामशक्कत जो तूने की अता है
जो की नहीं खताएँ ये उनकी ही सजा है
ये मातमो के मंजर हर राह मे लगे है
हैवान आदमी पर अब हावी हो चला है
गमगीन सी है गलियाँ सड़के भी सूनी सूनी
जिसको भी देखती हूँ लगता वो गमजदा है
पाला किये जिसे वो अपना लहू बहा कर
लख्ते जिगर वो सारे अब दे गए दगा है
आँखों को ख्वाब कितने परसे थे जिंदगी ने
शीशे सरीखे टूटे क्यों किसको ये पता है
माना ख़ुशी मुक्कमिल मिलती नहीं जमीं पर
थोड़ी सी जो मिली है लगती है ज्यूँ सजा है
कब तक छिपेगा सूरज इन गम के बादलो से
आने को है उजाले इतना मुझे पता है
जो की नहीं खताएँ ये उनकी ही सजा है
ये मातमो के मंजर हर राह मे लगे है
हैवान आदमी पर अब हावी हो चला है
गमगीन सी है गलियाँ सड़के भी सूनी सूनी
जिसको भी देखती हूँ लगता वो गमजदा है
पाला किये जिसे वो अपना लहू बहा कर
लख्ते जिगर वो सारे अब दे गए दगा है
आँखों को ख्वाब कितने परसे थे जिंदगी ने
शीशे सरीखे टूटे क्यों किसको ये पता है
माना ख़ुशी मुक्कमिल मिलती नहीं जमीं पर
थोड़ी सी जो मिली है लगती है ज्यूँ सजा है
कब तक छिपेगा सूरज इन गम के बादलो से
आने को है उजाले इतना मुझे पता है
ये मातमो के मंजर हर राह मे लगे है
ReplyDeleteहैवान आदमी पर अब हावी हो चला है
वाह बहुत खूब , बहुत सुंदर गजल है , ढेरो शुभकामनाये आंटी ,