जीवन संध्या की दहलीज पर चाहे ना चाहे कम या ज्यादा हर किसी को शायद इन अनुभवों से गुजरना ही पड़ता है पर फिर भी जिजीविषा कम क्यों हो राहते और भी हैं .......
मुबारक मुबारक जनमदिन मुबारक
मुबारक मुबारक मुबारक मुबारक
न बेटी की चाहत न बेटे की दस्तक
न पोती को फुरसत न पोते की आहट
मगर फिर भी तुमको जनमदिन मुबारक
ये दिल ये ज़िगर जाँ सदा साथ तेरे
येख्वाहिशें मेरी ये अरमान मेरे
ये साँसों की सरगम यही कह रही है
मुबारक मुबारक जनमदिन मुबारक
ये जूही ये गेंदा ये बूढ़ा सा बरगद
ये चम्पा ये बेला ये रानी का दरखत
वो सबसे बड़ा बागवान कह रहा है
यूँही महको महकाओ सारा ज़माना
सदा फूल जैसे खिले तन बदन सब
मुबारक मुबारक _________-------------------------
ये दरिया की कलकल यही कह रही है
ये भूरे से काले से बादल भी बोले
भिगों दें तेरे सूने नीरस पलों को
कि आँगन में तेरे हम बरसा दें सुख सब
मुबारक--------------------
खिले चाँद की चांदनी कह रही है
अरुणिमा भी इंगित यही कर रही है
व्यथा के अँधेरे न नज़दीक आयें
तुम जगमग रहो रश्मि ज्योति की बनकर
मुबारक __________
हवा गा रही बन के मोहन की मुरली
ये मोती जड़ित आसमां कह रहा है
कि खुशियों की झिलमिल मैं तुम पर लुटा दूँ
रहो स्वस्थ सुंदर सदा मुस्कराते
यूँ हीं खिलखिलाते बनाओ शतक तुम
मुबारक मुबारक -------------------------
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